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UP Election 2022

उत्तर प्रदेश से संगठन में नई जान लाना चाह रही हैं प्रियंका गांधी

लखनऊ में गांधी प्रतिमा के आगे प्रियंका ने मौन व्रत करके योगी सरकार को कड़ा संदेश दिया ही. साथ ही संकेत भी दिए कि आगामी दिनों में कांग्रेस पार्टी प्रदेश सरकार पर और भी आक्रमक होगी.

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उत्तर प्रदेश से संगठन में नई जान लाना चाह रही हैं प्रियंका गांधी
Source: @priyankagandhi

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं. वैसे-वैसे राजनीति जोर पकडती जा रही है. और जब से प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव हुए हैं तब से राज्य की राजनीति नई करवट लेने लगी है. एक ओर कई बैठकों के भारतीय जनता पार्टी योगी आदित्यनाथ के ही नेतृत्व में सियासी रण में उतरने का ऐलान कर चुकी है, वहीं बाकी दल भी नए साथी या खुद के दम पर लोहा लेने की पूरी तैयारी में जुट गए हैं. इन्हीं सब हलचलों के बीच प्रियंका गांधी के यूपी दौरे पर हर किसी की पैनी नजर है.

उत्तर प्रदेश प्रवास के पहले दिन प्रियंका गांधी ने पहले लखनऊ के हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया. उसके बाद वो वहीं मौन व्रत व धरने पर बैठ गयीं. जिसके बाद वहां हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा. राजनैतिक पंडित बताते हैं कि कांग्रेस में ऐसी उर्जा का संचार कई वर्षों के बाद देखने को मिला. कार्यकर्ताओं के हुजूम और उत्साह को देखकर प्रियंका गांधी निश्चित ही खुश हुई होंगी.

लखनऊ में गांधी प्रतिमा के आगे प्रियंका ने मौन व्रत करके योगी सरकार को कड़ा संदेश दिया ही. साथ ही संकेत भी दिए कि आगामी दिनों में कांग्रेस पार्टी प्रदेश सरकार पर और भी आक्रमक होगी. मौन व्रत के बाद मीडिया से बात करते हुए प्रियंका गांधी ने योगी सरकार पर चुन-चुनकर हमला बोला.

उन्होंने प्रदेश की बिगडती कानून व्यवस्था व कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान अव्यवस्था को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला. साथ ही उन्होंने ट्विटर से भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को घेरा. उन्होंने ट्वीट करके कहा मोदी जी के सर्टिफिकेट से यूपी में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान योगी सरकार की आक्रामक क्रूरता, लापरवाही और अव्यवस्था की सच्चाई छिप नहीं सकती. लोगों ने अपार पीड़ा, बेबसी का सामना अकेले किया। इस सच्चाई को मोदीजी, योगीजी भूल सकते हैं, जिन्होंने कोरोना का दर्द सहा, वे नहीं भूलेंगे.”

लखीमपुर की पीड़ित महिला से मिलकर लगाया दर्द पर मरहम

लखीमपुर खीरी में प्रियंका ने पसगंवा ब्लॉक निवासी उस महिला से मुलाकात की, जिनके साथ ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में अभद्रता हुई थी. नामांकन वाले दिल महिला की साड़ी खींचने का मामला सामने आया था. साथ ही प्रियंका ने दूसरी महिलाओं से भी भेंट की.

उन्होंने बीजेपी व सरकार को चेतवानी देते हुए कहा कि, “लोकतंत्र का चीरहरण करने वाले भाजपा के गुंडे कान खोलकर सुन लें, महिलाएँ प्रधान, ब्लॉक प्रमुख, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बनेंगी और उनपर अत्याचार करने वालों को शह देने वाली सरकार को शिकस्त देंगी. पंचायत चुनाव में भाजपा द्वारा की गयी हिंसा की शिकार अपनी सभी बहनों, नागरिकों के न्याय के लिए मैं राज्य चुनाव आयोग को पत्र लिखूँगी.”

परिणाम पक्ष में नहीं आए तो करवा दी हिंसा

पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने लोगों की परवाह किए बिना पंचायत चुनाव करवाए, क्योंकि उसने यह सोचा था कि परिणाम उसके पक्ष में आएंगे. मगर परिणाम उनकी इच्छा के अनुसार नहीं आए. इसलिए जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुख चुनावों में हिंसा करवा दी.

अराजकता प्रदेश सरकार खुद फैला रही है. उन्होंने कहा कि भाजपा राज में संविधान पर प्रहार की घटनाएं पहली बार नहीं हो रही हैं, लेकिन अब स्तर इतना गिर गया है कि प्रशासन, पुलिस और हर चीज का इस्तेमाल किया जा रहा है. हम यहां लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने आए हैं.

यूपी विधानसभा चुनावों से कांग्रेस में नई जान फूंकना चाहती हैं प्रियंका

राजनीति पर नजर रखने वाले कहते हैं कि प्रियंका समेत कांग्रेस पार्टी को समझ आ चूका है कि बिना उत्तर प्रदेश के दिल्ली बहुत दूर है. 2022 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हैं. जिसे अच्छा मौका मानते हुए कांग्रेस अपने लिए मौके बना रही है. अगर बात करें प्रियंका गांधी की तो वो सक्रिय राजनीति में 2019 के आम चुनाव से पहले ही आईं थीं.

उस वक्त भी वह उत्तर प्रदेश में ही सक्रिय रही थीं. लेकिन तब के हालात बहुत अलग थे. अब जनता में मौजूदा सरकार के प्रति रोष है. जिसे कांग्रेस अपने पक्ष में भुनाना चाह रही है. और इसी रणनीति के तहत प्रियंका गांधी सक्रिय हुई हैं. जानकार बताते हैं कि अगर प्रियंका गांधी यूँ ही सक्रियता बनाये रखती हैं तो कार्यकर्त्ता भी मन से काम करेंगे और संगठन में नई जान भी आएगी. लेकिन अगर पिछले कुछ वक्त को देखें तो पार्टी में किसी भी मुद्दे को लेकर सक्रियता सिर्फ कुछ दिनों तक ही रही है.

 

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UP Election 2022

आखिर क्यों चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में बढ़ते ही जा रहे हैं दलित उत्पीड़न के मामले ?

उत्तर प्रदेश में दलितों के कथित उत्पीड़न और उनके घरों में तोड़-फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. ऐसी दो घटनाएं कानपुर देहात और चंदौली में हुई हैं.

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उत्तर प्रदेश में दलितों के कथित उत्पीड़न और उनके घरों में तोड़-फोड़ की घटनाएं
Source: @priyankagandhi

उत्तर प्रदेश में दलितों के कथित उत्पीड़न और उनके घरों में तोड़-फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. ऐसी दो घटनाएं कानपुर देहात और चंदौली में हुई हैं. सोशल मीडिया पर दलित उत्पीड़न से संबंधित इन घटनाओं के वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस हरकत में आई, जबकि एक अन्य मामले में पीड़ितों ने आजमगढ़ पुलिस पर उनके साथ मारपीट करने और तलाशी के बहाने उनके घरों को तोड़ने के आरोप लगाए.

पुलिस ने हालांकि इन आरोपों से इनकार किया है. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दलित उत्पीड़न की इन घटनाओं पर जवाब मांगा है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दलित उत्पीड़न का ताजा मामला बीते आठ जुलाई को कानपुर देहात का है, जहां कुछ लोगों ने सार्वजनिक तौर पर 19 साल के एक युवक के बाल पकड़कर उसे खींचा और लात-घूसों से उसकी पिटाई की, लेकिन घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद बीते 10 जुलाई को मामला दर्ज किया गया.

पुलिस अधिकारी का क्या कहना है ?

पुलिस अधिकारी का कहना है, ‘कानपुर देहात की पुलिस ने इस घटना में शामिल चार लोगों को बीते रविवार को गिरफ्तार किया. घटना के वीडियो में नजर आ रहे लोगों को पकड़ने के लिए छापेमारी की गई. वहीं, पीड़ित का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है और डॉक्टरों ने उनकी हालत स्थिर बताई है.’

बता दें कि बीते 10 जुलाई को दो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसमें पेड़ से बंधे एक युवा को कुछ लोग पीटते दिखाई दे रहे हैं. ये लोग पीड़ित के निजी अंग में डंडा डालते नजर आ रहे हैं और उसकी जाति को लेकर उससे सवाल कर रहे हैं.

पीड़ित की पहचान श्रवण के तौर पर हुई

पुलिस का कहना है कि मामले में जांच शुरू कर दी गई है. पीड़ित की पहचान श्रवण के तौर पर हुई है, जो एक टेंट हाउस में काम करता है. कानपुर देहात के सर्किल ऑफिसर अरुण कुमार सिंह ने कहा, ‘शुरुआती जांच से पता चलता है कि प्रेम संबंधों को लेकर युवक से मारपीट की गई. अकबरपुर पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया है.’ सिंह ने कहा, ‘वीडियो में दिखाई दे रहे चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अन्य की तलाश में छापेमारी की जा रही है.’

वहीं, एक अन्य मामले में चंदौली पुलिस ने बरथारा खुर्द गांव में जमीन विवाद को लेकर दलित परिवार पर कथित तौर पर हमला करने और उनके घर को आग के हवाले करने के लिए बीते 10 जुलाई को ठाकुर समुदाय के चार लोगों को गिरफ्तार किया गया.

कई मकानों को तोड़ा गया, सैकड़ों पर मुकदमा दर्ज किया।

क्या-क्या हुआ नुकसान?

यह घटना आठ जुलाई को हुई, लेकिन वीडियो के वायरल होने के बाद एफआईआर दर्ज की गई. वीडियो क्लिप में लाठी-डंडों के साथ कुछ लोगों को देखा जा सकता है, जो अन्य लोगों को धमका रहे हैं. पीड़ित के घर को भी आग लगा दी गई. पीड़ितों में से एक वैजंती देवी की शिकायत के आधार पर दर्ज शिकायत में कहा गया है कि आरोपियों ने घर को आग लगाने से पहले उनके बेटे और परिवार के अन्य सदस्यों की पिटाई की.

चंदौली के एसीपी दयाराम का कहना है कि एफआईआर में नामजद चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है और अन्य को पकड़ने के लिए छापेमारी की जा रही है.

पुलिस ने कहा कि शुरुआती जांच के दौरान पता चला कि आरोपियों के स्वामित्व वाली कृषि भूमि के साथ ही पीड़िता वैजंती देवी का घर है और आरोपियों का कहना है कि दलित परिवार उनकी जमीन पर कूड़ा-कचरा फेंकता था.

बता दें कि लगभग एक हफ्ते पहले दलित परिवार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें आजमगढ़ जिले के रौनापार थानाक्षेत्र के पलिया गांव में उनके घर को कुछ लोग क्षतिग्रस्त करते देखे जा सके हैं. परिवार ने पुलिस पर 29 जून को उनके घर में तोड़-फोड़ करने का आरोप लगाया है. पीड़ित परिवार का आरोप है कि 29 जून को पुलिस की एक टीम उनके घर पहुंची, तलाशी के बहाने उनके घर में तोड़-फोड़ की और उनसे मारपीट की. वहीं, पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है.

ग्राम प्रधान के मकान में हुई तोड़फोड़

पुलिस ने बताया था कि पलिया गांव के मुखिया और उसके साथियों ने 29 जून को एक व्यक्ति की पिटाई की, क्योंकि उन्होंने मुखिया के बेटे और अन्य द्वारा कुछ लड़कियों को परेशान करने का वीडियो बना लिया था. ये लोग दो पुलिसकर्मियों से मारपीट के भी आरोपी हैं. आरोप है कि  पुलिस पर हमले के बाद देर रात पुलिस ने दलित बस्ती की घेराबंदी की. मुख्य आरोपी बताए जा रहे ग्राम प्रधान के मकान में तोड़फोड़ की और मकान को गिरा दिया.

परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने उनके घरों में लूटपाट भी की. पुलिस की कार्रवाई को देखकर ग्रामीण सहम गए और इसके बाद पुरुष व बच्चे घर छोड़कर भाग गए. दूसरे दिन पुलिस ने 11 नामजद व 135 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया. इस मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए गए हैं.

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UP Election 2022

आखिर क्यों 12 केंद्रीय मंत्रियों को मोदी कैबिनेट से किया गया आउट ?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का दो सालों बाद मंत्रीमंडल विस्तार कर लिया. इस दौरान कई मंत्रियों को प्रमोशन मिला तो कई मंत्रियों को मोदी कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया.

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Cabinet Reshuffle
Source: The Indian Express

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का दो सालों बाद मंत्रीमंडल विस्तार कर लिया. इस दौरान कई मंत्रियों को प्रमोशन मिला तो कई मंत्रियों को मोदी कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया. अभी तक मंत्रीमंडल में 53 मंत्री थे. जिनमें से 12 मंत्रियों को इस्तीफा दिलाया गया. कहने को तो इनमे से कुछ की वजह स्वास्थ्य बताया गया.

लेकिन असली वजह कुछ और ही थी. इस्तीफों की शुरुआत थावरचंद गहलोत से हुई थी. उन्हें राज्यपाल बनाकर एडजस्ट कर दिया गया. बकाया 11 मंत्रियों का क्या होगा. यह कोई नहीं जानता.

कौन हैं इस्तीफे वाले 12 मंत्री

1. रविशंकर प्रसाद
2. प्रकाश जावड़ेकर
3. थावर चंद गहलोत
4. रमेश पोखरियाल निशंक
5. हर्षवर्धन
6.सदानंद गौड़ा
7. संतोष कुमार गंगवार
8. बाबुल सुप्रियो
9. संजय धोत्रे
10. रत्तन लाल कटारिया
11. प्रताप चंद सारंगी
12. देबोश्री चौधरी

थावरचंद गहलोत को कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया

केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत मंगलवार को ही इस्तीफा दे दिया था. जिसके बाद मंत्रीमंडल विस्तार की खबरों ने और जोर पकड़ लिया था. उन्हें कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया है,. वे मोदी सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल में मंत्री रहे हैं. अभी तक वे केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय संभाल रहे थे.

कोरोना ने लील लिया इन तीन मंत्रियों को

जब से कोरोना आया. तब से मोदी सरकार कई मोर्चों पर विफल हो रही थी. फिर चाहे वो स्वास्थ्य को लेकर हो या फिर रोजगार को लेकर. कहने को तो लॉकडाउन की वजह से पढाई-लिखाई बंद सी रही. लेकिन छात्रों ने तमाम विषयों को लेकर सरकार को इस मोर्चे पर खूब घेरा. ऐसे कई मौके देखने में आये जब सरकार को इन मोर्चों पर चुप्पी साधनी पड़ी. उसके पास सवालों के कोई जवाब नहीं थे.

स्वास्थ्य मंत्रालय– दूसरी लहर में फेल रहे. इसलिए उन्हें हटाया गया.
शिक्षा मंत्रालय – नई शिक्षा नीति का सरकार को उतना श्रेय नहीं मिला. दोनों मंत्री हटाए.
श्रम मंत्रालय- श्रमिकों के पलायन, सुप्रीम कोर्ट की फटकार, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए पोर्टल नहीं बना पाए.

पश्चिम बंगाल में मिली हार का शिकार बने दो बंगाली मंत्री

बाबुल सुप्रियो

बाबुल सुप्रियो केंद्र सरकार में मंत्री थे. इसके बावजूद उन्हें विधानसभा चुनावों में उतारा गया. पार्टी को उम्मीद थी कि वो अपने साथ-साथ कई अन्य उम्मीदवारों को जिता कर विधानसभा पहुचाने का काम करेंगे. लेकिन हुआ इसका बिलकुल उलट. ऐसा मंत्री होकर भी विधायक का चुनाव हारे. बंगाल इलेक्शन में वो बिलकुल फेल हो गये. कार्यकर्ताओं के साथ अच्छा व्यवहार भी न था.

देबोश्री चौधरी

बंगाल चुनाव में असर नहीं छोड़ पाईं। इनका न ही आम लोगों से रिश्ता जमा रहा है, न ही वो मिनिस्ट्री में कुछ कर पाईं. यहाँ तक जब उन्होंने इस्तीफा दिया, तब लोगों ज्ञात हुआ कि केंद्र में यह भी मंत्री थीं.

12 मंत्रियों में से 10 मंत्री 60 साल के ऊपर

1. थावरचंद गहलोत: 73 साल

मध्यप्रदेश के शाजापुर से लोकसभा सदस्य रहे चुके हैं. मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद बने. राज्यसभा में सदन प्रमुख भी रहे. पहली मोदी सरकार में सामाजिक न्याय व सशक्तीकरण मंत्रालय में मंत्री रहे. उन्हें कर्नाटक का गवर्नर बनाया गया है.

क्यों हटाया गया: गहलोत को गवर्नर बनाया गया और उनके जाने से 5 पद खाली हो सके जो कैबिनेट रीशफल में उपयोगी रहे. वो अपनी मिनिस्ट्री में खूब धीमे माने जाते थे.

2. संतोष गंगवार: 72 साल

उत्तर प्रदेश के बरेली से लोकसभा सांसद. वित्त मंत्रालय और कपड़ा मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं. मोदी 2.0 की पहली कैबिनेट में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे.

क्यों हटाया गया: काफी सच बोलते थे. उन्होंने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ खत लिखा था. कहा जा रहा है कि यही उन्हें हटाने की वजह बनी. खबरें यहाँ तक भी हैं कि उन्होंने राज्य सरकार में बरेली से ही एक विधायक मंत्री को हटाने के लिए लाबिंग की थी. वो अब संगठन में ऊँचे पड़ पर पहुंच गये. उन्होंने अब इन्हें हटाने में लाबिंग कर दी.

3. प्रकाश जावडेकर- 70 साल

महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद. मोदी मंत्रिमंडल में संसदीय कार्य मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री, भारी उद्योग व सार्वजनिक उपक्रम मंत्री, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री और सूचना व प्रसारण मंत्री रहे हैं.

क्यों हटाया गया: जावडेकर का इस्तीफा आज के दिन की बड़ी खबर रही. वे सरकार के प्रवक्ता थे, लेकिन सरकार का पक्ष ठीक से नहीं रख पाए. पर्यावरण मिनिस्ट्री में भी उनकी लीडरशिप और कुछ फैसलों पर काफी सवाल उठे थे. उनके कई फैसले विवादास्पद रहे.

4. रतन लाल कटारिया- 69 साल

2014 में हरियाणा के अंबाला से लोकसभा सांसद बने. मोदी 2.0 की पहली कैबिनेट में जल शक्ति मंत्रालय में राज्य मंत्री थे.

क्यों हटाया गया: न ही उन्हें मिनिस्ट्री चलानी आई और न ही वे मास कॉटैक्ट रख सके.

5. सदानंद गौड़ा: 68 साल

बेंगलुरु उत्तर से लोकसभा सांसद. मोदी सरकार में रेलवे मंत्रालय, कानून और न्याय मंत्रालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय संभाल चुके हैं. वर्तमान में रसायन व उर्वरक मंत्री थे.

क्यों हटाया गया: अपने खराब परफॉर्मेंस और कर्नाटक के बदलते समीकरणों के कारण पद गंवा बैठे. अब कर्नाटक मामलों में भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष की ही चलती है.

6. रविशंकर प्रसाद- 66 साल

पटना साहिब से लोकसभा सांसद. अटल सरकार के दौरान कोयला मंत्रालय, कानून व न्याय मंत्रालय और सूचना व प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा संभाला. मोदी सरकार में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, कानून व न्याय मंत्री, इलेक्ट्रॉनिकी व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री और संचार मंत्री रहे.

क्यों हटाया गया: रवि शंकर प्रसाद को मंत्रिमंडल से निकला जाना सबसे बड़ा सरप्राइज है. ऐसा माना जा रहा है कि नए IT कानूनों पर सरकार का पक्ष ठीक से नहीं रख पाए. ज्यूडिशियरी से लेकर ग्लोबल IT कंपनियों तक उनके फैसलों पर सवाल उठते रहे.

7. डॉ. हर्षवर्धन- 66 साल

दिल्ली के चांदनी चौक से लोकसभा सांसद. मोदी सरकार में स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री थे.

क्यों हटाया गया: कोरोना की दूसरी लहर में स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी रही, जिसे इन्हें मंत्री पद से हटाने की वजह माना जा रहा है. डॉक्टर होते हुए भी हालात काबू में नहीं रख पाए और न ही आम जनता को राहत मिल सकी.

8. प्रताप सारंगी: 66 साल

2019 में ओडिशा के बालासोर से लोकसभा सांसद बने. सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम मंत्रालय के साथ पशुपालन, डेयरी व मछली पालन मंत्रालय के राज्यमंत्री थे.

क्यों हटाया गया: शुरुआत में अपनी सादगी को लेकर चर्चा में रहे, लेकिन बाद में मंत्रालय चलाने को लेकर उनके फैसले कुछ खास बदलाव नहीं ला सके.

9. संजय धोत्रे: 62 साल

महाराष्ट्र के अकोला से लोकसभा सांसद. मोदी मंत्रिमंडल में शिक्षा राज्य मंत्री, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री और सूचना मंत्रालय में राज्य मंत्री थे.

क्यों हटाया गया: बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य के चलते उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर जाना पड़ा.

10. रमेश पोखरियाल निशंक: 61 साल

उत्तराखंड के 5वें मुख्यमंत्री रह चुके हैं. हरिद्वार से लोकसभा सांसद. मोदी 2.0 में मानव संसाधन विकास मंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री थे.

क्यों हटाया गया: कोरोना के बीच नई शिक्षा नीति पर सरकार का पक्ष ठीक से नहीं रख पाए. साथ ही कुछ शिक्षण संस्थाओं ने उनके खिलाफ शिकायतें की थी.

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ओवैसी के आने से और रोचक बन गया है उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव

इस वर्ष 2022 को उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा के चुनावों में एआईएमआईएम ने सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है.

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Source: ThePrint

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चूका है. हर पार्टी अपने तीर-कमान को तैयार करने लगी है. चूलें कासी जाने लगी हैं. इसी बीच गत दिनों असदउद्दीन ओवैसी ने यूपी चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. उकी पार्टी 100 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. हालांकि उनकी पार्टी AIMIM 2017 में भी चुनाव लड़ चुकी है. लेकिन उस दौरान उनकी पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी थी. ‘ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन‘ यानी ‘एआईएमआईएम’ को मात्र पांच लाख वोट मिले थे.

ओम प्रकाश राजभर के साथ किया गया है गठबंधन

बावजूद इसके वर्ष 2022 को राज्य में होने वाले विधानसभा के चुनावों में एआईएमआईएम ने सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है. पार्टी के सुप्रीमो और सांसद असदउद्दीनओवैसी का कहना है कि उनकी पार्टी ने ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने का फैसला किया है और इस गठबंधन का नाम, ‘भागेदारी संकल्प मोर्चा‘ रखा गया है.

वैसे तो ओवैसी ज्यादातर अंग्रेज़ी में ट्वीट करते हैं. मगर इस गठबंधन की जानकारी उन्होंने हिंदी में लिख कर ट्वीट की है. ज़ाहिर है कि वो अपनी बात सोशल मीडिया के ज़रिये उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी क्षेत्रों तक पहुंचाना चाहते हैं.

घोषणा के बाद मच गई हलचल:

ओवैसी की इस घोषणा के बाद राजनैतिक गलियारों में काफी हलचल मच गई. हलचल मचना इसलिए भी लाजिमी था, क्योंकि वो बिहार चुनावों में कई पार्टियों का गणित बिगड़ चुके हैं. बिहार में RJD जैसे दल, जिन्हें मुस्लिम वोटों का एकतरफा समर्थन मिलता था. उसमें से काफी मात्रा में यह वोटर ओवैसी की तरफ चले गये. इसी वजह से यूपी की राजनीति में हलचल मच गई.

 

इससे पहले आशंका जताई जा रही थी कि ओवैसी बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव में उतरेंगे. लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी की  एआईएमआईएम या किसी भी अन्य दल के साथ किसी भी तरह के गठबंधन की कोई संभावना नहीं है.

गौरतलब है कि बिहार के विधानसभा के चुनावों में ‘एआईएमआईएम’ ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था. मायावती ने ये भी स्पष्ट किया कि बहुजन समाज पार्टी आगामी विधानसभा के चुनाव अपने ही बूते लड़ेगी. वह किसी अन्य दल से गठबंधन नहीं करेगी.

कई पार्टियों की होगी डगर कठिन

ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में क्या ‘एआईएमआईएम’ की मौजूदगी मतों के ध्रुवीकरण में भूमिका निभाएगी? क्या ‘एआईएमआईएम’ की मौजूदगी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों के लिए 2022 की डगर को और भी मुश्किल बना देगी?

पहले अनुमान लगाए जा रहे थे कि एआईएमआईएम 2022 में होने वाले विधानसभा के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के साथ जायेगी. लेकिन ऐसा नहीं होने की सूरत में राजभर ने भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद से बातचीत का दौर भी शुरू कर दिया है. ओवैसी का कहना है कि ओम प्रकाश राजभर के दल के अलावा गठबंधन के लिए उनकी किसी भी राजनीतिक दल से पहले कोई बात नहीं हुई.

अब देखना यह होगा कि ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ हुए इस गठबंधन से ओवैसी को कितना फायदा पहुंचता है. क्योंकि इतना तय है कि ओवैसी की मुस्लिम समाज में अच्छी पहुंच है. यह पहुंच वोटों में तब्दील कितनी होती है. यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन ओवैसी की AIMIM पार्टी पर भारतीय जनता पार्टी की बी टीम का तमगा जरुरु लगेगा. बसपा, सपा समेत कई अन्य दल मुस्लिम वोटों को बीजेपी का डर दिखाकर ओवैसी को वोट न देने की अपील जरुर करेंगे.

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